वो एक काला दिन था। घने बादल छाये थे। शीला की माँ की तबियत ख़राब थी। कैंसर की मरीज़ होने का कारण उसकी माँ को कुछ हजम नहीं हो रहा था। शीला ने हिम्मत नहीं हारी, न ही उसके परिवार ने। सबने उसकी माँ की अच्छे से देखभाल की।

लेकिन आज का दिन कुछ अमंगल था। शाम होते ही माँ की तबियत अचानक बिगड़ गयी। खून की उल्टियां आने लगी। शीला से ये सब देखा नहीं जा रहा था। वो बार बार फूट फूट के रोती।

आखिर काल आ ही गया। माँ की सांसें उखड़ने लगी। तब हड़बड़ाहट में माँ को अस्पताल ले जाने का प्रयास किया गया। किन्तु अस्पताल पहुँचते ही माँ की मृत्यु हो चुकी थी।

जीवन कितना क्षणभंगुर है, यह केवल मृत्यु के समय ही ज्ञात होता है। आज भी शीला जब वो दिन याद करती है तो उसकी आँखों से आंसू सहज ही छलक पड़ते हैं।

कहानी का सार: जीवन क्षणभंगुर है। सबको एक दिन मरना होगा।

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